मध्य प्रदेश का संस्कृत ग्राम झिरी

रेडियो कार्यक्रमों के निर्माण की प्रक्रिया में मेरी मुलाकात कई अदभुत व्यक्तियों से हुई है और कई शहरों तथा गाँवों को नज़दीक से देखने और समझने के अवसर भी मुझे मिले हैं । मेरे लिए जहाँ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को नज़दीक से देखना और उन्हें रिकॉर्ड करना एक बेहद रोमांचकारी अनुभव रहा है तो वहीं झिरी ग्रामवासियों से साक्षात्कार करना भी कम रोमांचकारी अनुभव नहीं था । वस्तुत: यह ऐसा गाँव है जिसे मैं शायद ही कभी भूल पाऊँ । इस गाँव से लौटते समय मैंने अपने अन्दर एक सकारात्मक ऊर्जा को महसूस किया जो मुझे निश्चित रूप से झिरी ग्रामवासियों से मिली थी ।

झिरी ग्राम मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के उत्तर पश्चिम में स्थित राजगढ़ ज़िले के अंतर्गत आता है और भोपाल से लगभग पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इस गाँव की ख़ासियत यह है कि यहाँ की लगभग एक हज़ार लोगों की आबादी में छ:सौ लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं और दैनिक जीवन में इसी भाषा का उपयोग करते हैं । गाँव के लगभग पचास प्रतिशत घरों के सुसज्जित प्रवेश द्वारों पर आपको 'संस्कृत गृहम' लिखा दिखाई देगा । झिरी निवासी उदयनारायण चौहान बताते हैं कि जिन घरों के सभी सदस्य परस्पर संस्कृत में ही वार्तालाप करते है उन घरों को यह पदवी दी गई है ।
मध्यप्रदेश का झिरी गाँव भारत का दूसरा संस्कृत ग्राम है । कर्नाटक के शिमोगा ज़िले में स्थित मुत्तूर ग्राम का नाम झिरी से पहले लिया जाता है किन्तु यदि बारीकी से देखा जाय तो झिरी का नाम पहले आना चाहिए । दरअस्ल मुत्तूर की अस्सी फीसदी आबादी ब्राह्मणों की है जिन्हें संस्कृत विरासत में मिली है । शेष बीस प्रतिशत लोग अन्य जाति के हैं जो संस्कृत नहीं बोलते । इसके उलट झिरी में सिर्फ एक ब्राह्मण परिवार रहता है । यहाँ अधिकतर लोग क्षत्रिय और अनुसूचित जनजाति के हैं । एक दशक पहले जब यहाँ के ग्रामवासियों ने संस्कृत ग्राम का सपना देखा था तब यहाँ एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे संस्कृत विरासत में मिली हो । गाँव के बड़े बुज़र्गों ने एक बैठक बुलाई और 'संस्कृत भारती' नामक संस्था से संपर्क किया जो संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित संस्था है ।संस्कृत भारती ने ग्रामवासियों के इस महत्वाकांक्षी स्वप्न में यथार्थ का रंग भरने के उद्देश्य से गाँव में एक संस्कृत पाठशाला आरंभ की । इस बीच इस संस्था के इंदौर स्थित कार्यालय के एक स्वयंसेवी की मुलाकात विमला पन्ना नाम की एक ऐसी युवती से हुई जिसे संस्कृत पढ़ाने के लिए कहीं भी जाना स्वीकार्य था । विमला पन्ना मूल रूप से छतीसगढ़ की उराँव जनजाति से संबंध रखती थी और इसाई धर्म अपना चुकी थी । जब वह शिक्षा के लिए भोपाल आई तो उन्हें कॉलेज में अपना मनपसंद विषय राजनीतिशास्त्र नहीं मिल पाया और मजबूरी में उन्हें संस्कृत भाषा पढ़नी पड़ी । किन्तु समय से साथ विमला को संस्कृत में गहरी रूचि हो गई । भोपाल से पढ़ाई पूरी होने के पश्चात संस्कृत में महारत हासिल करने के उद्देश्य से पहले वे दिल्ली गई और फिर इंदौर ।
संस्कृत भारती ने जब विमला के समक्ष झिरी की संस्कृत पाठशाला में शिक्षिका के रूप में कार्य करने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया । विमला जब झिरी पहुँची तो उन्हें यहाँ की बोली मालवी समझ में नहीं आती थी । उन्होंने मालवी सीखते हुए संस्कृत सिखाने का काम आरंभ कर दिया। गाँववालों ने विमला को गाँव की बेटी के रूप में स्वीकार किया और उसे यह अहसास नहीं होने दिया कि वह अपने घर से दूर है । संस्कृत पाठशाला में विमला के एक और सहकर्मी थे । धीरे धीरे दोनों के बीच संबंध प्रगाढ़ हुए और इन्होंने परस्पर विवाह करने का निर्णय लिया । विमला के घर वाले इस विवाह के लिए राज़ी नहीं थे । ऐसे में झिरी ग्रामवासियों ने अपनी इस लाड़ली की इच्छा का सम्मान करते हुए पूरी धूमधाम के साथ विवाह को संपन्न कराने की ज़िम्मेदारी ली । दुर्गाशंकर पांडेय नाम के एक ग्रामवासी ने विमला को गोद लिया और अपनी इस पुत्री का कन्यादान किया । आज विमला पहले से भी अधिक उत्साह के साथ संस्कृत के प्रसार में जुटी है और गाँव की महिलाओं और लड़कियों के लिए प्रेरणा का विषय बनी हुई है । अपने प्रयोग की सफलता ने झिरीवासियों को एक अनूठे आत्मविश्वास से भर दिया है और अब वे नए-नए प्रयोग कर रहे हैं । वेदिक युग की कल्पना को साकार करता ये गाँव आज पूरी तरह नशामुक्त ग्राम होने के साथ-साथ बारिश की एक-एक बूँद को सहेजने के प्रयास में जुटा है । जल संरक्षण की पारम्परिक तकनीक को अपनाते हुए गाँव वाले वर्षाजल को यहाँ के कुओं का जलस्तर बढ़ाने के काम में ला रहे हैं । गत वर्ष इस क्षेत्र में लगभग सूखे जैसी स्थिति के बावजूद गाँव में जलसंकट उत्पन्न नहीं हुआ । समरसता और एकता में निहित शक्ति का जीता जागता उदाहरण बन चुका यह गाँव विकास की भारतीय अवधारणा को न सिर्फ सही सिद्ध करता है, बल्कि इस अवधारणा के प्रति हमारे विश्वास को और दृढ़ता प्रदान करता है ।

अरे ख़ाँ नाम में क्या धरा हे

''कों ख़ाँ मुन्ना केसे हो ?'' भोपाल के शुरूआती दिनों में यह सवाल पूरे पाँच दिन तक मेरे लिए पहेली बना रहा । जब भी हसन भाई सामने पड़ते यह सवाल उछाल देते । हसन भाई प्रोडक्शन एसिस्टैंट थे । हर वक़्त उनके मुँह में पान रहता और कुर्ते पर चूने और कत्थे के दाग़ । उनके पुराने साथी उन्हें 'छम्मन मियाँ' कहा करते थे । हसन भाई रेडियो की पुरानी मशीनों पर डबिंग करने में सिध्दहस्त थे और उन्हें ऐसा करते हुए देखना एक मज़ेदार अनुभव होता । उनकी एक अंगुली पर हमेशा गीला चूना लगा होता जिसे वह थोड़ी-थोड़ी देर में खाते रहते । डबिंग करते समय वह अंगुली को मशीन पर लगने से बचाए रखते । 'कैसे' को 'केसे' कहना समझ में आने लगा था लेकिन यह 'ख़ाँ मुन्ना' क्या बला है, यह मेरी समझ के परे था । पाँचवे दिन शाम की डयूटी पर रेडियो स्टेशन पहुँचा । मैं अपनी कुर्सी पर बैठा ही था कि सीनियर अनाउन्सर मन्नान भाई ने 'डयूटी रूम' में प्रवेश किया और अपनी मोटी आवाज़ में सवाल दागा, ''ऑ ख़ाँ क्या चल रिया ?'' मेरा दिमाग़ बिजली से भी तेज़ गति से दौड़ा और सुबह चाय के खोखे पर एक फेंकू भोपाली की बात ताज़ा हो गई जो किसी ग़रीब को दिलासा दे रहा था, ''अरे ख़ाँ उसकी तो एसी की तेसी कर देंगे हम । तुम फ़िकर मत करो ख़ाँ ..... उसकी भेन का ....... ।'' मैं समझ गया कि ख़ाँ की पदवी देकर मुझे भोपालियों की जमात में शामिल कर लिया गया है । ख़ुशी की बात यह थी कि इसमे मेरा धर्म आड़े नहीं आया । चूँकि मेरी कद काठी छोटी है और चेहरे पर कुछ मासूमियत अब भी बाक़ी है इसलिए हसन भाई ने ख़ाँ के साथ प्यार से 'मुन्ना' भी जोड़ दिया है । अब नाज़ुक ख़ान या शहज़ादे का हाल पूछा तो सवाल बना - 'कों ख़ाँ मुन्ना केसे हो ?' उसी रात पौने नौ बजे जब दिल्ली के समाचार रिले होने लगे तो मन्नान भाई के साथ खाना खाते हुए पता चला कि भोपाल में अफ़गानिस्तान से बहुत से पठान आकर बस गए थे । एक दूसरे को 'ख़ाँ' कहने की परम्परा शायद इन्ही से शुरू हुई होगी ।
भोपाल में मेरा छठा दिन था; एक जीनियस व्यक्ति से मुलाकात हुई - लोकेन्द्र ठक्कर से । उन्होने घर आने का आग्रह किया । मैंने उनसे पूछा कहाँ रहते हैं और कैसे आना होगा तो बोले, ''पॉलीटैक्नीक चौराहे से रंगमहल के लिए 'भट
सुअर' पकड़ लेना और फिर थोड़ा आगे चलकर न्यू मार्केट से दस नम्बर वाली बस में चढ़ जाना । 'दो नम्बर' पर उतरकर 'दो नम्बर मार्केट' मिलेगा उसके पीछे फ़लाँ मकान नम्बर ..... ।'' इस पते में मेरे लिए दो पहेलियाँ थी - 'भट सुअर' और 'दो नम्बर' । सातवें दिन सुबह की डयूटी ख़त्म करने के बाद मैं इन पहेलियों को सुलझाने के लिए चल पड़ा । पॉलीटैक्नीक चौराहे पर पहुँचकर रास्ते के किनारे खड़े एक भोपाली से डरते-डरते पूछा, ''भाईजान ये भट ..... कहाँ मिलेंगे (सुअर नहीं कह पाया) ..... ?'' उसने तपाक से बाई ओर इशारा करते हुए कहा, ''ये क्या चला आ रिया हे सामने से ! '' बाईं तरफ से भड़भड़ाता हुआ एक टैम्पो नमूदार हुआ - बजाज का लम्बी थूथन वाला पुराना टैम्पो । मैं ऐसी गाड़ियाँ भोपाल रेलवे स्टेशन के पास देख चुका था और उसके पहले लखनऊ से लगे ग्रामीण इलाकों में । आज मैं इन्हे अलग नज़र से देख रहा था । शायद लम्बी थूथन के कारण ही इसे सुअर कहते होंगे यह सोचते हुए मैं टैम्पो में चढ़ गया । रंगमहल पहुँचा तो वहाँ ऐसे कई टैम्पो कतार से खड़े थे । आगे वाला टैम्पो लोगों से खचाखच भरा हुआ था और उसकी थूथन पर लगे बोनट को खोलकर एक रस्सीनुमा 'पुली' से उसे 'स्टार्ट' करने की कोशिश की जा रही थी । तार खींचते ही वह 'भट-भट-भट' करता और फिर बन्द हो जाता । इससे पहले इंजन स्टार्ट होता मैं इसके नामकरण का विज्ञान समझ चुका था । बस स्टॉप पर दस नम्बर जाने वाली बस लगी थी । मेरे चढ़ते ही बाहर खड़ा एक पतला सा लड़का भी मेरे पीछे-पीछे चढ़ा और ज़ोर से चिल्लाया - ''जान दो..... जान दो..... सनन जान दो ..... ।'' कुछ क्षण के लिए मैं डर गया
। मैंने सोचा यह किसकी जान की बात कर रहा है ? फिर मुझे याद आया कि भोपाल में शब्दों में प्रयुक्त मात्राओं को घटा बढ़ाकर अर्थ निकालना चाहिए । अब मुझे यक़ीन हो गया था कि इसका आशय 'जाने दो' से ही है । मैंने टिकट लिया, 'दो नम्बर' पर उतारने को कहा और निश्चिंत होकर बैठ गया । बस की रफ्तार के साथ मेरी सोच ने भी तेज़ी पकड़ ली । मैं सोचने लगा कि मुझ पर भोपाली ज़बान समझने का यह कैसा जुनून सवार हो गया है । इस वक़्त मेरी प्राथमिकता हिन्दी और ख़ासकर उर्दू का शब्दज्ञान बढ़ाने की होनी चाहिए । रेडियो में भाषा की शुध्दता पर विषेष ध्यान दिया जाता है और रेडियो में यह मेरे करियर का शुरूआती दौर है । अपने रेडियो में होने का लाभ उठाकर मैं हिन्दी और उर्दू के विद्वानों के बीच बैठकर लाभान्वित हो सकता हूँ । किन्तु र्मैंने अपने इस ज्ञानी विचार को सख्ती के साथ दबा दिया और पिछले छ: दिनों में भोपाली ज़बान सम्बन्धी अपने अर्जित ज्ञान को दोहराने लगा ।
यहाँ 'विद्यालय' को 'विधालय' कहा जाता है । महाराष्ट्र का भी प्रभाव है जैसे 'अठ्ठारह' को 'अठरा', 'कृति' को 'क्रुति' । 'मैं' और 'हैं' में 'अं' की मात्रा ग़ायब होती है लेकिन ऐसा अधिकतर नए भोपाल में होता है । मज़ेदार चीज़ें तो पुराने भोपाल में होती हैं । यहाँ आकर तो ऐसा लगता है कि कई 'स्वर' भोपाल पहुँच ही नहीं पाए हैं । अभी कल ही एक पुराने भोपाली अनाउन्सर ने ख़ुद से कम उम्र के एक नए नवेले डयूटी ऑफिसर को देखकर कहा
''एसे एसे केसे केसे हो गए
केसे केसे एसे एसे हो गए । ''
उस वक़्त मैं उसकी व्यथा भूलकर उसके द्वारा कहे गए शेर को उसी लहजे में पकड़ने की कोशिश करने लगा । मुझे इसमें मज़ा आने लगा था । फिर डयूटी के दौरान जितने भी फिल्मी गाने बजे मैंने उनको भोपालियों की तरह गुनगुनाने कोशिश की की थी - ''एक में ओर एक तू दोनों मिले इस ..... ।'' या फिर
''केसे केसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हें ।''
जिसने भी शोले देखी है उसे 'सूरमा भोपाली' का चरित्र याद रहता है । मुझे भी था लेकिन यहाँ आकर पता लगा कि शोले के 'सूरमा भोपाली' तो कहीं लगते ही नहीं हैं । जगदीप ने उस चरित्र में 'ऐ' की मात्रा की जगह एक मात्रा 'ए' और 'औ' की जगह 'ओ' का इस्तेमाल किया था । जैसे - ''एसे केसे पेसे दे दिंगे हम ?'' या फिर ''अरे ख़ाँ ये ओरतें-मोरतें मरद की बराबरी नहीं कर सकती क़सम से .....। '' यहाँ आकर पता चला कि कभी कभी इसके उलट भी होता है । यानि एक 'और' एक नहीं बल्कि एक 'ओर' एक दो होगा । मज़े की बात यह है कि जहाँ 'ओर' कहना होगा वहाँ यह 'और' हो जाएगा । जैसे - हटो मेरी 'और' मत आना । मैं इतना ही दोहरा पाया था कि कंडक्टर ज़ोर से चिल्लाया ''दो नम्बर वाले बड़ लो..... बड़ लो .....'' दो नम्बर आ
चुका था और बस से उतरते ही एक दुकान पर लिखा था 'दो नम्बर दूध की डेरी ।' मुझे परसाई जी की कहानी 'नम्बर दो की आत्मा' याद आ गई । अगर यह दूधवाला कुछ गड़बड़ कर भी दे तो इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती । यह तो पहले ही चेता चुका है - 'दो नम्बर दूध'.....। लोकेन्द्र से बातचीत के दौरान पता लगा कि न्यू मार्केट से आने वाली बसों के स्टाप के नाम पर आस-पास की बस्तियों और बाज़ारों के नाम पड़ गये हैं । जैसे दो नम्बर ..... पाँच नम्बर, सात नम्बर, दस नम्बर, ग्यारह नम्बर आदि । चार नम्बर ग़ायब है लेकिन 'सवा चार' और 'साढ़े चार' है हालाँकि इस रूट पर अब बसें नहीं चलती । 'सवा छ:' और 'साढे छ:' भी है । 'छ: नम्बर का मार्केट' और 'दस नम्बर का मार्केट' इस इलाक़े के बड़े मार्केट हैं । 'पाँच नम्बर पेट्रोल पंप' का असली नाम शायद ही कोई जानता हो वगैरह वगैरह । उस शाम लोकेन्द्र की बातें सुनकर मुझे भोपाली ज़बान के साथ-साथ नामकरण की इस विचित्र परम्परा के प्रति भी भारी आकर्षण महसूस होने लगा । पहले मुझे लगा कि भोपाली शायद नामकरण के मामले में आलसी रहे होंगे लेकिन भोपाल में महीना भर निकलते-निकलते मुझे अहसास हो गया कि भोपाली उच्चारण के मामले में ही नहीं बल्कि नामकरण के मामले में भी विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं । यहाँ नामकरण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है । नाम और गुण का बहुत गहरा रिश्ता है । नाम के अनुरुप गुण न होने पर नाम प्रचलित हो ही नहीं सकता भले ही वह कितना भी ख़ूबसूरत क्यूँ न हो । भोपाल के बारे में थोड़ा सा अध्ययन किया तो पाया कि भोपाल का इतिहास जहाँ से मिलना आरंभ होता है वहीं से नामकरण की इस परम्परा के उदाहरण भी मिलने शुरू हो जाते हैं ।
ग्यारहवीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने एक बस्ती बसाई । बस्ती राजा भोज की पाली हुई थी इसलिए नाम 'भोजपाल' पड़ना ही था फिर 'स्लैंग प्रेमी' भोपालियों ने 'भोजपाल' को भोपाल कर दिया । यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि 'स्लैंग' के मामले में भोपाली अमरीकियों से भी आगे हैं । पान या चाय की दुकान पर खड़े होकर आप कोई भी वार्तालाप सुनें तो आपको माँ के या भेन के कड़े जैसे कुछ जुमले सुनने को मिलेंगे । ('ब' और 'ह' मिलकर यहाँ 'भ' बन जाता है जैसे 'बहन' 'भेन' और 'बेहतरीन' 'भेतरीन') आपको लगेगा यह अर्थहीन तकिया कलाम हैं लेकिन दरअस्ल यह बहुत ही वीभत्स गालियाँ होती हैं जो स्लैंग में पेश की जाती हैं या सहज ही निकल जाती हैं । हाँ तो हम भोपाल के इतिहास से नामकरण की अनूठी परम्परा के उदाहरण ढूँढ रहे थे । अठ्ठारहवीं शताब्दी में दोस्त मोहम्मद ख़ान ने जब भोपाल की पहली मस्जिद बनाई तो उसका नाम पड़ा 'ढाई सीढ़ी की मस्जिद' । आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसका यह नाम क्यूँ पड़ा होगा । बाद में दोस्त मोहम्मद ख़ान ने भोपाल की क़िलेबन्दी के लिए शहर की सीमा पर सात दरवाज़े बनवाए । इन दरवाज़ों के पास अलग-अलग दिन हफ्तावार बाज़ार लगा करता था । ज़ाहिर है जिन इलाक़ों में यह दरवाज़े थे उनका नाम पड़ा - इतवारा, पीरगेट, सोमवारा, मंगलवारा, बुधवारा और जुमेराती (गुरूवारीय) । मुस्लिम बहुल बस्ती में जुमे यानि शुक्रवार के दिन छुट्टी रहा करती होगी शायद इसलिए जुमे के नाम पर किसी बस्ती या इलाक़े का नाम सुनने को नहीं मिलता । शनिवार को जहाँगीराबाद में अभी भी शनिचरी नाम की एक हाट लगती है लेकिन इस नाम को किसी स्थान से नहीं जोड़ा गया; इसे भोपाली लोगों की सूझबूझ ही कहेंगे । भोपाल की मशहूर शासक बेगम शाहजहाँ ने जब अपने चुनिंदा बारह ख़ादिमों के लिए
बारह आशियाने बनवाए तो इनका नाम 'बारह महल' पड़ गया । यह नाम और संक्षिप्त होकर आज 'बारामहल' रह गया है । भोपाल में पीरगेट इलाके में दुर्गा जी का एक सिध्द मंदिर है । कहते हैं, जब यह बन रहा था तो साम्प्रदायिक तनाव हो गया था और स्थिति को 'तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रित' रखने के उद्देश्य से इस इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया । भोपालियों को मंदिर का नाम मिल गया; 'कर्फ्यू वाली माता का मंदिर' । इस मंदिर को अधिकतर भोपाली आज भी इसी नाम से पुकारते हैं । मस्जिदों के भी कमोबेश ऐसे ही नाम आपको मिल जायेंगे जैसे 'कल्लो बीया की मस्जिद', 'कुलसूम बी की मस्जिद', 'लतीफ़ पहलवान की मस्जिद', 'नन्ही बी की मस्जिद' वगैरह वगैरह । नामकरण की इस परम्परा का पुराने और नए भोपाल में समान रूप से निर्वाह किया जाता रहा है । स्टॉप के नम्बरों पर स्थानों के नामों की चर्चा की जा चुकी है । यह सारे स्टॉप नए भोपाल में ही आते हैं । नए भोपाल में जब कुल 1250 नए सरकारी क्वार्टर बने तो इस कॉलोनी का नाम 'बारा सौ पचास' ऐसा पड़ा कि छूटने का नाम ही नहीं लेता । यहाँ पर एक अस्पताल है 'जे.पी. अस्पताल' लेकिन भोपाली इसे 'बारा सौ पचास' अस्पताल के नाम से ही जानते हैं । इसी तरह नए शहर में ही 'पचहतर बंगले' और 'पैंतालीस बंगले' भी उसी नाम से जाने जाते हैं । श्यामला पहाड़ी पर आठ मंत्रियों के लिए सरकारी बंगले बनाए गए तो इस जगह का नाम 'आठ बंगले' पड़ गया । आज जहाँ भोपाल के आला नौकरशाह रहते हैं उस कॉलोनी का नाम है 'चार इमली' । अभी तक हमने ज्यादातर बेजान चीज़ों की बात की जिनका नाम उनको जानदार बना देता है लेकिन यार दोस्तों के उपनाम रखने में भी भोपालियों का कोई तोड़ नहीं है । जैसे रईस 'चप्पू', 'डब्बू' मियाँ, अज़ीम 'भोले', सईद 'चम्मच', सादिक 'मास्टर पतले', क़ादर 'ढक्कन', आरिफ 'मक्खन' वगैरह वगैरह । यह नाम ऐसे ही नहीं निकले हैं इन्हें देने वालों ने बाक़ायदा प्रसव पीड़ा झेली है और यह सब सम्भव होता है 'पटियों' पर । जी हाँ 'पटिए', जो भोपाली संस्कृति का अभिन्न अंग हैं । पटिए यानि जिन्हें दिन में दुकान का सामान जमाने के काम में लाया जाता था और दुकान बन्द होने के बाद यार दोस्तों के साथ बैठने के लिए । बाद में पुराने शहर में जगह-जगह स्थाई पटिए बन गए । रात के दो-ढाई बजे तक यह पटिए आबाद रहते । पटियों पर सिर्फ़ 'बतौलेबाज़ी' नहीं बल्कि सियासत, हॉकी जैसे मसलों पर भी चर्चायें होती थी । पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा भी एक ज़माने में पटियों पर बैठा करते थे । नवाबों के दौर में कई गुप्तचर रात

को पटियों पर बैठकर जनता के 'मूड' की टोह लेते और नवाब को ख़बर करते थे । इन्ही पटियों पर हँसी ठिठोली के वक़्त या परनिंदा का चर्खा चलाते चलाते कोई नया उपनाम कात लिया जाता जैसे चची 'सयानी', ख़ाला 'पेंदी', गोस्वामी 'एलबम', राशिद 'पिस्सू', रईस 'रस्सू ढीले' वगैरह वगैरह ।
यदि आप भोपाल में नए-नए आए हैं या कभी आपका भोपाल आना हो तो यहाँ के कुछ चुनिंदा पर्यटन स्थल देख कर बैठ मत जाइएगा । असली भोपाल को मेरी नज़र से देखिए और सुनिए । यक़ीन कीजिए आपके लबों पर हर वक़्त मुस्कान तैरती रहेगी । मैं पिछले अठ्ठारह सालों से यहाँ रह रहा हूँ लेकिन अब तक भोपाल से उकताया नहीं हूँ ।

मस्जिदों का शहर भोपाल

अगर आप साल भर तक, हर रोज़ एक नई मस्जिद में नमाज़ अदा करना चाहें तो भोपाल आ जाइए । भोपाल ऐसा शहर है जहाँ एशिया की सबसे छोटी मस्जिद से लेकर एशिया की छठी सबसे बड़ी मस्जिद भी आपको मिलेगी । 'द रॉयल जर्नी ऑफ भोपाल' के लेखक अख्तर हुसैन के अनुसार भोपाल ने डेढ़ सौ बरस पहले ही 365 मस्जिदों का आंकड़ा हासिल कर लिया था, तब इस्लामी देशों के किसी शहर में भी इतनी मस्जिदें नहीं थी । मस्जिदों की गिनती के लिहाज से भारतीय उपमहाद्वीप में आज भोपाल का दूसरा स्थान है बांग्लादेश की राजधानी ढाका के बाद ।यहाँ दरख्तों के नाम पर, बागों के नाम पर, औरतों के नाम पर मस्जिदें हैं; मस्जिदों में मस्जिद है ...ये मस्जिदों का शहर है ।ग्यारहवीं सदी की शुरुआत में मालवा के परमार वंश के शासक राजा भोज ने भोजपाल नाम की एक बस्ती को आबाद किया था । यही बस्ती बाद में भोपाल के नाम से प्रसिध्द हुई । राजा भोज के शासनकाल के लगभग सात सौ साल बाद सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में एक साहसी अफगान भोपाल आया जिसका नाम था दोस्त मोहम्मद ख़ान । वह अफगानिस्तान के तिरह के मीर अज़ीज़ का वंशज था और मूल रुप से औरंगज़ेब की सेना में भर्ती होने की नीयत से आया था । कुछ दिनों उसने दिल्ली में औरंगज़ेब की सेना में काम भी किया किन्तु वहाँ एक युवक की हत्या करने के बाद वह फ़रार हो गया । वह भागकर मालवा आया और उसने चन्देरी पर सैय्यद बंधुओं को आक्रमण में हिस्सा लिया । बाद में इस लड़ाके ने पैसे लेकर लोगों के लिए लड़ना शुरु कर दिया । इसी सिलसिले में दोस्त मोहम्मद को भोपाल की गोंड रानी द्वारा बुलवाया गया और रानी ने मदद की एवज़ में उसे बैरसिया परगने का मावज़ा गाँव दे दिया । रानी की मृत्यु के बाद 1722 में दोस्त मोहम्मद ख़ान ने भोपाल पर कब्ज़ा कर लिया ।उसने राजा भोज के टूटे हुए क़िले के पास भोपाल की चहारदीवारी बनवाई और इसमें सात दरवाज़े बनवाए जो हफ्तों के दिनों के नाम से थे । सन 1726 में दोस्त मोहम्मद ख़ान ने अपनी बीवी फतेह के नाम पर एक क़िला बनवाया - फतेहगढ़ का क़िला । इसके मग़रबी बुर्ज पर एक मस्जिद बनवाई गई । इस छोटी सी मस्जिद में दोस्त और उसके सुरक्षा कर्मी नमाज़ अदा किया करते थे । यह एशिया की सबसे छोटी मस्जिद के रुप में जानी जाती है और इसका नाम है 'ढाई सीढ़ी की मस्जिद' ।
इसका नाम 'ढाई सीढ़ी की मस्जिद' क्यूँ पड़ा यह कहना बहुत मुश्किल है क्योंकि ढाई सीढ़ी आज कहीं भी नज़र नहीं आती लेकिन शायद जब यह बनी होगी तब ढाई सीढ़ी जैसी कोई संरचना इससे अवश्य जुड़ी रही होगी । इसे भोपाल की पहली मस्जिद कहते हैं । हालाँकि कुछ लोग आलमगीर मस्जिद को भोपाल की पहली मस्जिद कहते हैं । उनका मानना है कि औरंगज़ेब का जहाँ-जहाँ से गुज़र हुआ उनके लिए जगह जगह आलमगीर मस्जिदें तामीर की गई और इस लिहाज से इसका नाम पहले आना चाहिए ।मौखिक इतिहास पर विश्वास न कर यदि तथ्यों का विष्लेषण किया जाय तो 'ढाई सीढ़ी की मस्जिद' को ही भोपाल की पहली मस्जिद कहा जाएगा । यहीं से शुरु होता है भोपाल में मस्जिदें तामीर करवाने का सिलसिला । दोस्त मोहम्मद ख़ान के बाद एक लम्बे वक्फ़े तक कोई ख़ास निर्माण कार्य नहीं हुआ । बाद में उसके पोते फैज़ मोहम्मद ख़ान ने भोपाल की झील के किनारे कमला महल के पास एक मस्जिद बनवाई जो आज रोज़ा है और इसे मकबरे वाली मस्जिद के नाम से जाना जाता है । ऐसा स्थान जहाँ मस्जिद और मज़ार साथ में होते हैं उसे रोज़ा कहा जाता है । दोस्त मोहम्मद ख़ान की बहू माजी ममोला, जो विवाह के पूर्व हिन्दू थी, ने तीन मस्जिदें बनवाई । इनमें से एक थी तालाब के किनारे स्थित माजी साहिबा कोहना जिसे भोपाल की पहली जामा मस्जिद भी कहा जाता है । दूसरी मस्जिद थी गौहर महल के पासवाली माजी कलाँ और तीसरी इस्लाम नगर जाने वाले रास्ते नबीबाग में ।माजी ममोला के बाद तीन नवाब हुए और तीसरे नवाब की बेटी थी कुदसिया बेगम इनका अस्ल नाम था गौहर आरा । कुदसिया बेगम बहुत धार्मिक थी और उन्होने पहली बार मक्का मदीना में हाजियों के ठहरने के लिए इंतज़ाम की पहल की । पुराने भोपाल शहर के बीचों बीच स्थित जामा मस्जिद का निर्माण कुदसिया बेगम ने ही करवाया था ।
1832 में इसका संग -ए - बुनियाद रखा गया और इसे मुक्कमल होने में 25 साल लग गए । इस मस्जिद के निर्माण में तब 5, 60, 521 रुपए खर्च हुए थे । यह मस्जिद बहुत ऊँचे आधार पर बनी है और इस आधार पर कई दुकानों का भी प्रावधान किया गया था ।ये दुकानें आज भी लगती है और मस्जिद के इर्दगिर्द एक रंगबिरंगी दुनिया का अहसास कराती हैं । जामा मस्जिद के आधार पर फूल पत्तियों की घुमावदार आकृतियों हिन्दू स्थापत्य शैली का प्रभाव स्पष्ट करती हैं । यह मस्जिद एक तरह से भोपाल में स्थापत्य की शुरुआत है । जामा मस्जिद के दक्षिण पश्चिम की तरफ बमुश्किल एक मील दूर एक और मस्जिद आपको मिलेगी जिसका नाम है मोती मस्जिद ।
इसकी संगे बुनियाद भी कुदसिया बेगम ने ही रखी थी । बाद में इसे कुदसिया बेगम की बेटी सिकन्दर जहाँ ने मुकम्मल करवाया । सिकन्दर जहाँ का अस्ल नाम मोती बीवी था और इन्ही के नाम पर मस्जिद का नाम पड़ा । इसमें सफेद संगमरमर और लाल पत्थर का इस्तेमाल किया गया है और यह स्थापत्य का बेहद खूबसूरत नमूना है ।अब रुख़ करते हैं भोपाल की सबसे बड़ी मस्जिद यानि ताजुल मसाजिद का ताजुल मसाजिद का अर्थ है 'मस्जिदों का ताज'।
सिकन्दर बेगम ने इस मस्जिद को तामीर करवाने का ख्वाब देखा था । दरअस्ल 1861 के इलाहबाद दरबार के बाद जब वह दिल्ली गई तो उन्होने पाया कि दिल्ली की जामा मस्जिद को ब्रिटिश सेना की घुड़साल में तब्दील कर दिया गया है । उन्होने अपनी वफादारियों के बदले अंग्रेज़ों से इस मस्जिद को हासिल किया और ख़ुद हाथ बँटाते हुए इसकी सफाई करवाकर शाही इमाम की स्थापना की । इस मस्जिद से प्रेरित होकर उन्होने भोपाल में भी ऐसी ही मस्जिद बनवाना तय किया । सिकन्दर जहाँ का ये ख़ाब उनके जीते जी पूरा न हो पाया तो उनकी बेटी शाहजहाँ बेगम ने इसे अपना ख्वाब बना लिया । उन्होने इसका बहुत ही वैज्ञानिक नक्षा तैयार करवाया । ध्वनि तरंग के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए 21 खाली गुब्बदों की एक ऐसी संरचना का मॉडल तैयार किया गया कि मुख्य गुंबद के नीचे खडे होकर जब ईमाम कुछ कहेगा तो उसकी आवाज़ पूरी मस्जिद में गूँजेगी । शाहजहाँ बेगम ने इस मस्जिद के लिए विदेश से 15 लाख रुपए का पत्थर भी मंगवाया किन्तु चूँकि इसमें अक्स दिखता था अत: मौलवियों ने इस पत्थर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी । आज भी ऐसे कुछ पत्थर दारुल उलूम में रखे हुए हैं । शाहजहाँ बेगम का ख्वाब भी अधूरा ही रह गया क्योंकि गाल के कैंसर के चलते उनका असामयिक मृत्यु हो गई । इसके बाद सुल्तानजहाँ और उनके बेटा भी इस मस्जिद का काम पूरा नहीं करवा सके । आज जो ताजुल मसाजिद हमें दिखाई देती है उसे बनवाने का श्रेय मौलाना मुहम्मद इमरान को जाता है जिन्होने 1970 में इस मुकम्मल करवाया ।यह दिल्ली की जामा मस्जिद की हूबहू नक़ल है । आज एशिया की छठी सबसे बड़ी मस्जिद है लेकिन यदि क्षेत्रफल के लिहाज से देखें और इसके मूल नक्षे के हिसाब से वुजू के लिए बने 800 X 800 फीट के मोतिया तालाब को भी इसमें शामिल कर लें तो बकौल अख्तर हुसैन के यह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद होगी ।
भोपाल की कुछ और क़दीमी मस्जिदें हैं जो देखने लायक हैं जैसे अहमदाबाद पैलेस स्थित सोफिया मस्जिद । यह संभवत: भारत की पहली एक मीनारा मस्जिद है ।
इक़बाल मैदान के पास छोटी सी झक सफेद हीरा मस्जिद भले ही अपनी ओर आपका ध्यान आकर्षित न कर पाए किंतु शाहजहाँ बेगम द्वारा बनवाई गई यह ऐसी मस्जिद है जो भोपाल के बाहर टुकड़ों में तैयार की गई थी और यहाँ लाकर इसे जोड़ भर दिया गया था ।भोपाल में मस्जिदों के बनने का सिलसिला जारी है लकिन इसकी क़दीमी मस्जिदों की बात अलहदा है । इनकी ऊँची ऊँची मीनारों ने कई दौर देखे हैं । इन्होने कभी इंसानियत को ख़ुद से ऊँचा उठता देखा है तो कभी उसे हैवानियत में तब्दील होते हुए । लेकिन ये गुंबद, ये मीनारें ये मस्जिदें सदियों से एक पैग़ाम दे रही हैं ओर वह पैग़ाम है इंसानियत का ।

नैनीताल के नाम

उत्तराखंड आन्दोलन जब अपने चरम पर था तब मैंने यह लेख लिखा था । प्रभाकर क्षोत्रिय जी ने इसे 'वागर्थ' में रम्य रचना के नाम से छापा । जिस क़स्बेनुमा शहर का ज़िक्र इसमें किया गया है - उसका नाम है नैनीताल । उत्तराखंड की स्थापना के सात साल बाद भी पहाड़ और ख़ासकर नैनीताल की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी इस लेख को लिखते समय थी …

सड़क

वह सड़क सिर्फ़ एक मील लंबी है और वह सिर्फ़ सड़क नहीं है । ऐसा नहीं कि उस एक मील की लंबाई के दोनों सिरों पर खाइयाँ हैं अलबत्ता दोनों सिरों पर उसकी प्रकृति ज़रूर बदल जाती है और साथ ही साथ नाम भी । वह एक मील किसी ख़ास मुकाम तक नहीं पहुँचाता बल्कि वह हर वक्त लोगों को, ज़िन्दगी को पकड़ने की कोशिश में लगा रहता है । अंग्रेज़ों के ज़माने में उसे मॉल रोड कहते थे । आज़ादी के बाद उसका नाम बदल दिया गया हालांकि नाम बदल जाने से वो सड़क बिल्कुल भी नहीं बदली । पहले की तरह ही उसे एक तरफ से नीली झील लगातार भिगोती रही और दूसरी तरफ एकदम चढ़ाई वाला पहाड़ ज्यों का त्यों खड़ा रहा । सड़क के बीच और किनारे चिनार और पाँगड़ भी वैसे के वैसे ही खड़े रहे ।

जब से मैंने होश संभाला तभी से हर शाम मल्लीताल से तल्लीताल तक की इस एक मील की दूरी को मापने की आदत सी लग गई थी । वैसे यह उस क़स्बेनुमा शहर की अपनी ख़ास संस्कृति भी कही जा सकती है । वहाँ के लगभग सभी लोग शाम को किसी न किसी बहाने मॉल पर उतर ही आते हैं । विशुद्ध रूप से घूमने न सही, सब्ज़ियाँ ख़रीदनी हों या भले ही मंदिर जाना हो लेकिन मॉल का एक चक्कर तो तयशुदा है । झील ने किनारे-किनारे लाठी लिए हुए कुछ अत्यन्त वृध्द लोग भी घूमते मिल जाएंगे जिन्हें देखकर लगेगा कि कोई अदृश्य शक्ति ही इन्हे चला रही है लेकिन वह शक्ति मेरे लिए दृश्य है । किसी ज़मीन की तासीर होती है कि आप कितना भी चलें, थकेंगे नहीं, कुछ ऐसी ही ज़मीन पर बनी सड़क है वह । मॉल पर घूमने का जुनून देखना हो तो बरसात या सर्दियों में देखिए । जब वहाँ सात-सात दिनों तक लगातार बारिश होती रहती है, तब भी मॉल के दीवानों के हौसले कतई पस्त नहीं होते, हाँ छतरियाँ उनके साथ जरूर जुड़ जाती हैं । बर्फ वाले दिनों, अकड़ी अंगुलिओं से मूंगफली ठूँगते हुए ये लोग उसी सहज भाव से घूमते मिलेंगे ।

एक अजीब सा भावनात्मक रिश्ता है मेरा उस सड़क के साथ और न जाने कितनी स्मृतियाँ उससे जुड़ी है....... बपचन से बेरोज़गारी तक की । वाटर बॉल, सॉफ्टी, भुट्टे, गुब्बारे....... । प्रभातफेरियाँ, परीलोक से आई तितलियाँ....... । गुदगुदी, फिकरे......। राजनीति थिएटर और दर्शन पर गरमागरम बहसें और निराशा भरी कविताओं वाले दिन ।

वह सड़क ज़िन्दगी का पर्याय न सही लेकिन उससे ज़िन्दगी चिपकी हुई ज़रूर है और उसके बल पर कई ज़िन्दा भी हैं - भुट्टे वाले रेस्तराँ वाले, होटल वाले, रिक्शेवाले , ट्रैवल एजेंसी वाले और कई तरह के पहाड़ी तोहफों की दुकानदारी करने वाले । भले ही मैं उस सड़क से सैकड़ों मील दूर होऊँ, अवसाद के क्षणों में मैं उस पर पहुँच ही जाता हूँ और हर बार एक नई शक्ति लेकर लौटता हूँ ।

इस बार ठीक चार साल बाद उस क़स्बेनुमा शहर लौटने का मौका मिला है । काठगोदाम से जैसे ही बस ने पहाड़ों पर चढ़ना शुरू किया, बस के साथ-साथ मेरा दिमाग़ भी हिचकोले खा रहा है । पता नहीं कैसी होगी वो सड़क...... न जाने क्या-क्या बदल गया होगा....... देखता हूँ इस बार तल्लीताल से मल्लीताल तक सड़क पर कितने परिचित मिलते हैं - वैसे वहाँ अब साथ वाला शायद ही कोई मिले...... नौकरी की तलाश में बी.ए. करते ही तो भागने लगे थे सब के सब...... मेरे आकाशवाणी में निकलने से पहले कितना अकेलापन महसूस करने लगा था मैं वहाँ ...... ऐसे में मेरी सबसे अच्छी मित्र वो सड़क ही तो थी...... मैं जब जब उस पर अकेला घूमता, उदास होता तो वह मुझे बहलाती, मुझसे बातें करती...... ''याद हैं तुम्हें उस दिन यहाँ पर ऐसा हुआ था........।'' बस लंबे मोड़ पर घूमकर तल्लीताल 'डाट' पर लग गई है । डाट यानि जहाँ से तालाब का पानी ख़तरे के निशान से ऊपर हो जाने पर निकाला जाता है और डाट यानि उस शहर का स्टेशन । डाट से तल्लीताल से मल्लीताल तक की वह सड़क पूरी की पूरी दिखाई देती है और जब पानी ठहरा हो तो उसका अक्स भी । आज अक्स के साथ-साथ सड़क भी ठहरी हुई है । सारी नावें किनारों पर लगी हैं और झील का पानी जमा हुआ सा दिखता है । मुझे मालूम था कि लोग उत्तराखंड और पहाड़ों की अस्मिता के लिए लड़ रहे हैं फिर सर्दियाँ तो हैं ही । ऐसे मैं सैलानी निश्चित रूप से ही नही के बराबर होंगे, जानता था, किंतु ऐसे सन्नाटे की उम्मीद न थी । इन वर्षों में मैं उस शहर की तरक्की से भी नावाकिफ़ था । हाँ, चिठ्ठियों के ज़रिए यह ज़रूर जानता था कि कष्मीर जाने वाले ज्यादातर सैलानी इधर का रुख करने लगे हैं इसलिए इस बीच काफ़ी होटल बन गए हैं । लेकिन आज मैंने खुद अपनी ऑंखों से पहाड़ की फटी छाती देखी । जहाँ देवदार और बाँज बसते थे वहाँ कंक्रीट के रंग बिरंगे कुकुरमुत्ते उग आए थे । फटी छाती का मलवा बारिश में बहकर सड़क पर उतर आया था । हड़ताल और बंद के दौर में सफ़ाई नहीं हुई होगी, जगह-जगह मलवे और कूड़े के ढेर लगे थे । मुझे याद है कि आगरा में ताजमहल के आसपास की सफ़ाई की बात को लेकर एक गाइड ने वहाँ मुझसे कहा था कि मेरे शहर जैसी साफ़ सड़कें उसने कहीं नहीं देखी । उसका अभिप्राय मॉल रोड से ही था । तब मुझे बहुत फ़क्र हुआ था अपने क़स्बेनुमा शहर पर । गंदगी से ढकी वही सड़क आज बेजान सी लेटी थी । उस पर न भुट्टे वाले थे न मूंगफली वाले, न रिक्शे वाले न होटल के गाइड । कुछ इक्के-दुक्के लोग थे जो निश्चित तौर पर किसी न किसी काम के सिलसिले में ही निकले होंगे । उनके चेहरों पर अनिश्चितता और दहशत साफ़-साफ़ पढ़ी जा सकती थी । मुज़फ्फ़नगर वाली घटना को बीते लगभग तीन माह होने को आए लेकिन लगता है कि कल ही इन लोगो ने सबकुछ अपनी ऑंखों के आगे घटता देखा है । उत्तराखंड के लिए लड़ने वाले लोगों पर हुए अत्याचार के संबंध में अख़बारों में पढ़ा ज़रूर था लेकिन उसे महसूस नहीं कर पाया था । आज कुछ अंदाज़ा लगा पाया हूँ । लगभग चौथाई सड़क पार कर चुका हूँ लेकिन अभी तक कोई परिचित नहीं मिला । मोड़ पर घूमते हुए मेरी नज़र झील पर है - पानी उसी तरह जमा हुआ सा दीखता है । नज़रें वापस सड़क पर लौटती हैं और मैं बुरी तरह चौंक पड़ता हूँ । सामने सड़क के बगल में पहाड़ को काटकर बनाए गये तीन चार मंज़िले होटलों की कतार खड़ी है । मैंने याद किया यहाँ पर पांगड़ को पेड़ों का झुरमुट हुआ करता था । अक्टूबर के महीने में जब पत्ते गिरते तो सड़क पर पीले रंग का कार्पेट सा बिछ जाया करता था । इसी सड़क पर घूमते समय एक बार दादाजी ने बताया था ''भव्वा तुझे मालूम है, अंग्रेज़ों के टाइम मॉल रोड में ट्रक नहीं चल सकते थे । भारी गाड़ियों को वो तल्लीताल में ही रुकवा देते थे और मॉल रोड के ऊपर वे जो पहाड़ है ना, शेर का डाँडा,' इस पर कोई मकान नहीं बना सकता था और जो ज़रूरी थे वो लकड़ी के बनाए जाते थे ताकि पहाड़ पर और इस सड़क पर ज़ोर न पड़े ।'' दादाजी की वह बात शायद इसलिए याद हो गई क्योंकि तब मुझे बहुत अटपटा सा लगा था कि इतने बड़े पहाड़ पर या इतनी चौड़ी सड़क पर मकानों का भला क्या ज़ोर पड़ सकता है लेकिन कुछ ही वर्षों बाद मुझे लगा कि वाकई अंग्रेज़ कितने चिंतित थे पहाड़ के लिए, इस सड़क के लिए । हालांकि उनके लिए यह शहर एक 'नॉस्टेल्जिया' था - टेम्स नदी का किनारा, लंदन की कुहासे भरी शामें और पानी के विस्तार को अपनी खिड़कियों में समेटे कुछ मध्यम रौशनी वाले रेस्तराँ और वे अपने 'नॉस्टेल्जिया' को सुरक्षित रखना चाहते थे लेकिन कुछ भी हो उन्होंने इसे बचाये तो रखा ही था ।

मुझे बहुत ग़ुस्सा आने लगा । कौन पास करता है यह नक्शे ...... इनकी संवेदनायें मर गई हैं क्या...... कैसा तंत्र है यह...... क्यों खिलवाड़ कर रहे है ये पहाड़ के साथ......। गले में हल्का सा दर्द होने लगा है । लाइब्रेरी वाला मोड़ आ चुका है अब सड़क के किनारे झील पर झुके मजनू के पेड़ों का सिलसिला शुरू होगा लेकिन ये क्या-ये सड़क को क्या हुआ...... ये क्यों झुकी है झील की तरफ ? मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा है । झील वाले छोर की तरफ सड़क का किनारा जगह-जगह से टूटकर पानी में समा चुका है । कई मंजनू के पेड़ अब वहाँ नहीं हैं, कुछों की जड़े ऊपर हैं और सर पानी में डूबा हुआ । काफ़ी दूर तक सड़क का यही हाल है । उसके आगे सड़क को बचाने के लिए 'रिटेनिंग वॉल' बनाई गई है किन्तु दबाव से उसका पेट किसी गर्भवती महिला की तरह फूला हुआ है । मेरे गले का दर्द बहुत तेज़ हो गया है । सड़क बहुत उदास सी दीखती हैं । मेरा क्रोध भी धीरे-धीरे उदासी का रूप ले लेता है । चलते-चलते आज थकान महसूस करने लगा हूँ । अचानक सड़क मुझसे बातें करने लगी है- ''तू क्यों दुखी होता है रे ! मैं अपने लिए उदास थोड़े ना हूँ, मुझे मालूम है मुझ पर दबाव हैं, मै बूढ़ी हो रही हूँ, टूट रही हूँ लेकिन यह मेरे दुख का कारण नहीं । मैं इसलिए उदास हूँ कि मेरी गोद में बड़ा हुआ एक ख़ूबसूरत सा नौजवान मेरी अस्मिता के लिए आवाज़ उठाने गया था, तीन महीने होने को आए, लेकिन वो लौटकर नहीं आया । मैं इसलिए उदास हूँ कि मैं एक अर्से से किसी को खुशियाँ नहीं बाँट सकी...... मैंने कब से उस नौजवान जैसी खिलखिलाहटें नहीं सुनी ।''

दूसरा छोर






तुम मेरी तरह हो...बिल्कुल मेरी तरह
हम पर बिछी ये रेत एक सी
चलने वाले अलग रहे हों भले ही
क़दमों की लकी़रें एक सी
मैं भी आधा भीगा ,आधा सूखा तुम सा
आधा डूबा आधा तिरता तुम सा
गीले टुकड़ों पर काई का रंग दूब का रंग
सूखे छोरों पर उग आई नागफनी के फूलों का रंग....
हर मोड़ पर मुडे़ हैं संग संग लहरों की तरह
या कि मुड़ती हैं पटरियाँ हर मोड़ पर जिस तरह
हम दोनों को छूती ,भिगोती,
हम में से होकर बहती ये ठंडी धार
हम कितने एक से हैं .....ओ ..नदी के दूसरे छोर

सामुदायिक रेडियो : एक नए युग की शुरुआत

मीडिया विस्फोट के इस दौर में जहाँ एक ओर भारतीय उपग्रह चैनल आपसी प्रतिस्पदर्धा में सिर्फ बाज़ार को दृष्टिगत रखते हुए, कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निजी एफएम चैनलों की भीड़ फिल्संगीत और पॉप म्यूज़िक का प्रसारण कर राजस्व कमाने की होड़ में जुटी है। आकाशवाणी अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को स्वीकारता है किन्तु राजस्व अर्जन के बढ़ते दबाव के चलते आकाशवाणी ज़बरदस्त बदलाव के दौर से गुज़र रहा है । आम भारतीय की स्थानीय समस्याओं और हितों को दृष्टिगत रखते हुए आकाशवाणी द्वारा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के प्रसारण के साथ- साथ देश भर में स्थानीय स्तर पर कई 'लोकल रेडियो स्टेशन' आरम्भ किए गए । देश भर में बिछे रेडियो चैनलों के जाल के बावजूद लगातार यह महसूस किया जाता रहा कि कुछ है जो छूट रहा है, छोटे समुदायों के प्रसारण हितों और अधिकारों का पूर्णतया संरक्षण नहीं हो पा रहा है। सम्भवत: इसीलिए भारत में सामुदायिक रेडियो को वैधानिक मान्यता मिलते ही कई समुदायों का ध्यान इस ओर गया है।

सामुदायिक रेडियो को किसी एक परिभाषा में बाँधना सम्भव नहीं है। प्रत्येक देश के संस्कृति सम्बन्धी क़ानूनों में अन्तर होने के कारण देश और काल के साथ इसकी परिभाषा बदल जाती है। किन्तु मोटे तौर पर किसी छोटे समुदाय द्वारा संचालित कम लागत वाला रेडियो स्टेशन जो समुदाय के हितों, उसकी पसंद और समुदाय के विकास को दृष्टिगत रखते हुए ग़ैरव्यावसायिक प्रसारण करता है, सामुदायिक रेडियो केन्द्र कहलाता है। ऐसे रेडियो केन्द्र द्वारा कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज कल्याण, सामुदायिक विकास, संस्कृति सम्बन्धी कार्यक्रमों के प्रसारण के साथ-साथ समुदाय के लिए तात्कालिक प्रासंगिता के कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा सकता है। सामुदायिक केन्द्र का उद्देशय समुदाय के सदस्यों को शामिल कर समुदाय के लिए कार्य करना है।

सामुदायिक रेडियो की शुरूआत अमरीका में बीसवी सदी के चौथे दशक में हो गई थी। इसके पूर्व तीसरे दशक में, डेविड आर्मस्ट्राँग, एफएम प्रसारण का अविष्कार कर रेडियो प्रसारण के एक नए युग का सूत्रपात कर चुके थे। अपने शुरूआती दिनों में अमरीकी रेडियो का स्वरूप मुख्यतया व्यावसायिक था। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन द्वारा एफएम बैंड की निचली आवृतियों (881 मेगा हर्ट्ज़ से 919 मेगा हार्ट्ज़ तक) शैक्षणिक रेडियो के लिए सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया। एफएम रेडियो की संभावनाओं को पहचानने का यह पहला प्रयास था। एफएम रेडियो तकनीक की सुविधाजनक प्रणाली और इसकी कम लागत को देखते हुए भविष्य दृष्टाओं को इसमें एक ओर संभावना नज़र आई सामुदायिक रेडियो केन्द्र की संभावना । सामुदायिक रेडियो की कल्पना ने जब साकार रूप लिया तो यह संचार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी क़दम सिद्ध हुआ

पहला सामुदायिक रेडियो केन्द्र 'वेस्ट कोस्ट' में लुइस हिल नाम के मशहूर पत्रकार द्वारा आरम्भ किया गया। 1946 में इससे जुड़े प्रसारणकर्ताओं ने ''पेसिफिका फाउंडेशन'' की स्थापना की। विश्व युद्ध के पश्चात् उस समय विभिन्न राष्ट्रों के बीच समझ पैदा करने को आवश्यकता महसूस की जा रही थी।इसी उद्देश्य से पेसेफिका फाउंडेशन ने सामुदायिक रेडियो प्रसारण आरम्भ किया। इस फाउंडेशन से जुड़े शांतिप्रिय बुद्धिजीवी इस बात से भली भाँति परिचित थे कि रेडियो के प्रायोजक इसके कार्यक्रमों को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित कर सकते हैं अत: यह निर्णय लिया गया कि श्रोताओं की सहायता से ही केन्द्र का व्यय वहन किया जाएगा। आवश्यक राशि जुटाने के बाद फाउंडेशन ने बर्कले, कैलिफोर्निया से 15 अप्रैल 1949 को प्रसारण आरम्भ कर दिया। इस रेडियो केन्द्र से आज भी प्रसारण हो रहा है और अपनी तरह का यह सबसे पुराना रेडियो केन्द्र है। लेटिन अमरीकी देश बोलीविया में खदान श्रमिकों द्वारा 1949 में आरम्भ किया गया रेडियो केन्द्र, सामुदायिक रेडियो का अनूठा उदाहरण है। बोलीविया अपनी चाँदी एवम् टिन की खानों के लिए एक समय विश्व प्रसिद्ध था। शहरों से मीलों दूर इन खानों में हज़ारों श्रमिक कार्य करते थे। इनके लिए मनोरंजन और संचार के माध्यमों का नितांत अभाव था। इन श्रमिकों ने अपने वेतन का एक भाग संचित कर उस राशि से एक रेडियो केन्द्र स्थापित किया । प्रसारण की लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि इसने स्थानीय पत्र और तार सेवा के महत्व को तक कम दिया। श्रमिकों के संदेश सांस्कृतिक गतिविधियों की सूचना आपातकालीन उदघोषणाएं , सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों सम्बन्धी जानकारियों के साथ-साथ ट्रेड यूनियन और सरकार के बीच संवाद के समाचार प्रसारित होने लगे। कुछ ही वर्षों में बोलीविया में ऐसे 26 सामुदायिक रेडियो केन्द्रों से प्रसारण आरम्भ हो गया। सैन्य शासन के दौरान कई बार इन केन्द्रों को कुचल दिया गया किन्तु इस विचार में इतनी शक्ति थी कि ये बार-बार उठ खड़ा हुआ । इंग्लैंड में कम्युनिटी रेडियो का विचार उन अवैधानिक रेडियो स्टेशनों से आरम्भ हुआ जो सत्तर के दशक में बरमिंघम, बिस्टल, लंदन और मैनचेस्टर में ऐफ्रो-कैरिबियाई अप्रवासियों द्वारा आरम्भ किए गए। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'पाइरेट रेडियो' की संज्ञा दी थी किन्तु अवैधानिक होने के बावजूद इन केन्द्रों ने कम्युनिटी रेडियो की शक्ति को सिद्ध कर दिया
में सामुदायिक रेडियो की आधारशिला सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में रखी जब उसने अपने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में यह कहा कि 'रेडियो तरंगे लोक सम्पति हैं'। अन्नामलाई विश्वविद्यालय , चेन्नई का 'अन्ना एफएम' भारत का पहला कैम्पस कम्युनिटी रेडियो केन्द्र बना, जिसका प्रसारण 01 फरवरी 2004 से आरम्भ हुआ। इसे ई अम आर सी ।द्वारा संचालित किया जाता है। 16 नवम्बर 2006 को भारत सरकार द्वारा एक नई कम्युनिटी रेडियो नीति को अधिसूचित किया गया । इसके अनुसार ग़ैरव्यावसायिक संस्थायें, जैसे स्वयंसेवी संस्थायें, कृषि विश्वविद्यालय ,सामाजिक संस्थायें, भारतीय कृषि अनुसंधान की संस्थायें, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा शैक्षणिक संस्था कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । ऐसी कोई भी संस्था, जो व्यावसायिक, राजनैतिक, आपराधिक गतिविधियों से सम्बद्ध हो या जिसे केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा अवैध घोषित किया गया हो, कम्युनिटी रेडियो खोलने की हक़दार नहीं है। व्यष्टि या व्यक्ति विशेष को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है। ऐसी पंजीकृत संस्थायें जो कम से कम तीन वर्षों से सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रही हों, कम्युनिट रेडियो के लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती हैं । इसके लिए कोई लाइसेंस फीस देय नहीं है । आवेदक को रु 2500- क़े मामूली प्रोसेसिंग शुल्क के अतिरिक्त रु 25,000- क़ी बैंक गारंटी जमा करनी होती है । लाइसेंस मिलने पर इन्हें 100 वॉट के एफएम ट्रांसमिटर के ज़रिए प्रसारण करने की अनुमति मिलती है । इसका एंटेना अधिकतम 30 मीटर ऊँचाई तक स्थापित किया जा सकता है । ऐसे ट्रांसमीटर की पहुँच 12 किमी क़े घेरे तक सीमित होती है । केन्द्रों को अपने आधे कार्यक्रम यथासंभव स्थानीय भाषा या बोली में, स्थानीय स्तर पर ही बनाने होते हैं। भारत में निजी एफएम और कम्युनिटी रेडियो पर अब तक समाचारों के प्रसारण की अनुमति नहीं हैं। एक घंटे के प्रसारण समय में पाँच मिनट के विज्ञापन बजाए जा सकते हैं। प्रायोजित कार्यक्रमों के प्रसारण की अनुमति नहीं है किन्तु राज्य अथवा केन्द्र सरकार से प्रायोजित कार्यक्रम प्राप्त होने की दशा में इन्हें प्रसारित किया जा सकता है । आने वाले कुछ वर्षों में भारत भर में लगभग चार हज़ार कम्युनिटी रेडियो केन्द्र खोले जाने का अनुमान है मीडिया का निजीकरण और पूर्णत: स्वतंत्र मीडिया आम भारतीय के लिए मायने नहीं रखता। आज भी भारत, गाँव में बसता है और भारतीय ग्रामीणों की प्रसारण आवश्कताओं की पूर्ति बड़े प्रसारक नहीं कर सकते। जिस देश में बहुत कम दूरियों पर लोगों की ज़रूरतें, भाषा और संस्कृति बदल जाती हो वहाँ यह संभव भी नहीं है। सामुदायिक रेडियो, सामुदायिक कल्याण, पर्यावरण जागरूकता, विविधता में एकता ओर समग्र विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। यही नहीं कुछ और स्वतंत्रता मिलने पर यह छोटे-छोटे केन्द्र प्रजातंत्र को उसका सही अर्थ प्रदान कर सकते हैं।

Andaman Islands: India’s secret paradise

When I informed my colleagues about my plan to visit Andaman, one of them mockingly asked “Kalapani ja rahe ho?” That time I felt bad about the comment but when I was returning from Andaman and reminded the same, I was smiling. We are so prejudiced about Andaman that whenever we think of it, our brain makes pictures of a massive jail standing on a remote island surrounded by horrific black sea tides. The word Kalapani, for most of us, means a place from where nobody returns .This bias generally prevents us to make colorful pictures of Andaman. When we reached Port Blair, our first destination was the Cellular Jail. Luckily when we got there, a light and sound show was waiting for us. All tourists had gathered inside the jail. It was getting darker and a weird feeling could have been read on every face. It was a vicarious feeling. Perhaps everyone was thinking of those freedom fighters who had sacrificed their families,
homes, lives …everything. I was thinking of their loneliness and the atrocities done to them by the British. The light and sound show started with a patriotic song and it went through spines. I felt as if I was standing in a pious temple. My eyes were wet and that very evening my whole idea about Andaman was changed. It turned into, in my mind, one of the most sacred and beautiful part of my country. Day two finds us in Havelock Island which is famous for Radhanagar Beach .It is the most beautiful beach on the island and was rated as the best in Asia by ‘Time’ in 2004.Walking on nice white sand backed by a forest, is a fascinating experience White sand is made by the erosion of coral
reefs. Coral can only be found in waters where the temperature never drops below 21C. Darker sands do not reflect light and heat, so it becomes very hot.World class sands keep cool in the sunshine, while inferior sands become hot. Ferries are the only way on or off the island. 2-3 ferries arrive daily from Port Blair and take 3-4 hours. Our next destination was Ross Island via the North Bay.The Bay is famous for its coconut jungle and for its light house.
Snorkeling is very popular here, with several options. Local shopkeepers rent out fins and masks for Rs 50/each. There are greatreefs for snorkeling in the bay. The Ross Island is about 2 km west of North Bay and can be reached by a short boat ride. Bearing the haunted look today, the Ross Island was the Administrative Headquarters
for the Andaman and Nicobar before an earthquake rocked it in 1941. The headquarters were then shifted to Port Blair. One can see remnants of an opulent past in the ruins of the church, swimming pool and the chief commissioner’s residence with its huge gardens and grand ballrooms. There is also a cemetery and a small museum managed by the Indian Navy.
Andamans’ unparalleled beauty is not confined to beaches only. Andaman and Nicobar Islands have 84% forest with lush greenery. More than 150 plants and animal species are endemic to the islands with about more than 110 varieties of wild orchids. Stunning beaches, active volcanoes, pristine coral reefs, lush green forests, mangroves and 100-foot high mahua trees.. the Andaman Islands are India’s secret paradise.