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माँ

पहाड़ पर चढ़ते हुए
माँ ने कहा था
घर आने से पहले रुकना नहीं
ठंडे पसीने पर लगी बर्फीली हवाएं
बदन तोड़ देती हैं

माँ

अजीब होती है माँ
जो बेटा उसे जितना अधिक रुलाता है
उसके लिए वह उतना ही अधिक रोती है

दूसरा छोर






तुम मेरी तरह हो...बिल्कुल मेरी तरह
हम पर बिछी ये रेत एक सी
चलने वाले अलग रहे हों भले ही
क़दमों की लकी़रें एक सी
मैं भी आधा भीगा ,आधा सूखा तुम सा
आधा डूबा आधा तिरता तुम सा
गीले टुकड़ों पर काई का रंग दूब का रंग
सूखे छोरों पर उग आई नागफनी के फूलों का रंग....
हर मोड़ पर मुडे़ हैं संग संग लहरों की तरह
या कि मुड़ती हैं पटरियाँ हर मोड़ पर जिस तरह
हम दोनों को छूती ,भिगोती,
हम में से होकर बहती ये ठंडी धार
हम कितने एक से हैं .....ओ ..नदी के दूसरे छोर

नज़्म

मौसम बंधे थे क़दमों से ,
रुत आहट से बदल जाती थी ,
सर्द मौसम में बर्फ़ ढके आँगन पर
वो जो आ जाय तो धूप निकल आती थी .
ज़र्द हो रहे बुढ़ा रहे चिनारों पर ,
बेमौसम ही बहार उतर आती थी ,
कड़ी धूप से दरकी हुई ज़मीन पर ,
साथ क़दमों के फुहार चली आती थी .
घुटन भरे उदास सावन में,
यकायक साँस लौट आती थी ,
उन क़दमों की आहट सुनते ही
बरसात भी थम जाती थी ।
वो क़दम जिन्हें थाम के चूमा था ,
मेरी हद से दूर निकल गए ,
जिंदा मछलियों के मानिंद हाथ से ,
सारे मौसम फिसल गए ।

तीन क़ते रेलगाड़ी में

जब से एक खाली कुल्हड़
खिड़की से गिरा और चूर हुआ
मैं तमाम सफर खिड़की से
जो दूर हुआ तो दूर हुआ।
एक भीड़ मुसल॒सल
कस्बों ,शहरों का नाम पढ़ती रही ,चढ़ती रही, उतरती रही
मैं ख़ुद से तेरा पता पूछता रहा
तैरता रहा ,डूबता रहा।
तेरे शहर से गुज़रते वक्त
जिस्म में एक जुम्बिश सी हुई
बचपन में तुझ संग खेली कोई हवा
शायद मुझे छू के गई ।

लड़की

रात की पाली के बाद
जब वह थका माँदा भूखा ही सो गया
तब सपने में लड़की आई ज़रूर
लेकिन रजनीगंधा नही बल्कि रोटियाँ लेकर
फोकस रोटियों पर था और लड़की धुंधलके में
फिर लड़की फ्रेम से बाहर हो गई
वह रोटियों पर टूट पड़ा
सपना टूट गया
भूख बेकाबू हो चुकी थी
कुछ खा चुकने के बाद
जब वह बिस्तर पर लेटा
उसे अफ़सोस हुआ कि सपने में
उसका ध्यान सिर्फ़ रोटियों पर था.

नज़्म

मौसम बंधे हैं क़दमों से ,
रुत आहट से बदल जाती है ,
सर्द मौसम में बर्फ़ ढके आँगन पर
वो जो आ जाय तो धूप निकल आती है .
ज़र्द हो रहे बुढ़ा रहे चिनारों पर ,
बेमौसम ही बहार उतर आती है,
कड़ी धूप से दरकी हुई ज़मीन पर ,
साथ क़दमों के फुहार चली आती है.
घुटन भरे उदास सावन में,
यकायक साँस लौट आती है,
उन क़दमों की आहट सुनते ही
बरसात भी थम जाती है .